श्री हनुमान चालीसा
श्री हनुमान चालीसा ॥ दोहा ॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥ चौपाई ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥०१॥ राम दूत अतुलित … Read more
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग
मोक्षसंन्यासयोग मुक्ति और संन्यास का योग अर्जुन उवाच सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ৷৷18.1৷৷ arjuna uvāca saṅnyāsasya mahābāhō tattvamicchāmi vēditum. tyāgasya ca hṛṣīkēśa pṛthakkēśiniṣūdana৷৷18.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ ৷৷18.1॥ श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं … Read more
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रद्धात्रयविभागयोग श्रद्धा के तीन प्रकारों का विश्लेषण अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः৷৷17.1৷৷ arjuna uvāca yē śāstravidhimutsṛjya yajantē śraddhayā.nvitāḥ. tēṣāṅ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāhō rajastamaḥ৷৷17.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति … Read more
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
दैवासुरसम्पद्विभागयोग दैवी और अदैवी स्वभाव के विभाजन का योग श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥16.1॥ sri bhagavanuvaca abhayan sattvasansuddhih jñanayogavyavasthitih. danan damasca yajñasca svadhyayastapa arjavam৷৷16.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, … Read more
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
पुरुषोत्तमयोग परमात्मा की अनंत शक्तियों का वर्णन श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ৷৷15.1৷৷ sri bhagavanuvaca urdhvamulamadhahsakhamasvatthan prahuravyayam. chandansi yasya parnani yastan veda sa vedavit৷৷15.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और … Read more
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
गुणत्रयविभागयोग तामसिक, राजसिक, सात्विक गुणों की चर्चा श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ sri bhagavanuvaca paran bhuyah pravaksyami jnananan jnanamuttamam. yajjnatva munayah sarve paran siddhimito gatah৷৷14.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! समस्त ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ इस परम-ज्ञान को मैं तेरे लिये फिर … Read more
अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग शरीर और आत्मा का संबंध श्रीभगवानुवाच क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ ksetrajnan capi man viddhi sarvaksetresu bharata. ksetraksetrajnayorjnanan yattajjnanan matan mama৷৷13.3৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से … Read more
अध्याय 12: भक्तियोग
भक्तियोग भक्ति के विभिन्न प्रकार और उनका महत्व अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ arjuna uvaca evan satatayukta ye bhaktastvan paryupasate. yecapyaksaramavyaktan tesan ke yogavittamah৷৷12.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को … Read more
अध्याय 11: विश्वरूपदर्शन योग
विश्वरूपदर्शन योग भगवान कृष्ण का विश्वरूपदर्शन अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ arjuna uvaca madanugrahaya paraman guhyamadhyatmasanjnitam. yattvayoktan vacastena moho.yan vigato mama৷৷11.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया … Read more