बजरंग बाण

Bajrang Baan

॥ दोहा ॥ निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करें सनमान । तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान ॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमंत संत हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ॥०१॥ जन के काज विलम्ब न कीजै । आतुर दौरि महा सुख दीजै ॥०२॥ जैसे कूदि सिन्धु वहि पारा । सुरसा बद पैठि विस्तारा ॥०३॥ … Read more

श्री हनुमान चालीसा

Shri Hanuman Chalisa

श्री हनुमान चालीसा ॥ दोहा ॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥ चौपाई ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥०१॥ राम दूत अतुलित … Read more

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग

अथाष्टादशोऽध्यायः- मोक्षसंन्यासयोग

मोक्षसंन्यासयोग  मुक्ति और संन्यास का योग अर्जुन उवाच सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ৷৷18.1৷৷ arjuna uvāca saṅnyāsasya mahābāhō tattvamicchāmi vēditum. tyāgasya ca hṛṣīkēśa pṛthakkēśiniṣūdana৷৷18.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्‌! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ ৷৷18.1॥ श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं … Read more

अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग

अथ सप्तदशोऽध्यायः- श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धात्रयविभागयोग  श्रद्धा के तीन प्रकारों का विश्लेषण अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः৷৷17.1৷৷ arjuna uvāca yē śāstravidhimutsṛjya yajantē śraddhayā.nvitāḥ. tēṣāṅ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāhō rajastamaḥ৷৷17.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति … Read more

अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

अध्याय सोलहवाँ दैवासुरसम्पद्विभागयोग

दैवासुरसम्पद्विभागयोग  दैवी और अदैवी स्वभाव के विभाजन का योग श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥16.1॥ sri bhagavanuvaca abhayan sattvasansuddhih jñanayogavyavasthitih. danan damasca yajñasca svadhyayastapa arjavam৷৷16.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, … Read more

अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग

अध्याय पंद्रहवाँ पुरुषोत्तमयोग

पुरुषोत्तमयोग  परमात्मा की अनंत शक्तियों का वर्णन श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ৷৷15.1৷৷ sri bhagavanuvaca urdhvamulamadhahsakhamasvatthan prahuravyayam. chandansi yasya parnani yastan veda sa vedavit৷৷15.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और … Read more

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय चौदह

गुणत्रयविभागयोग  तामसिक, राजसिक, सात्विक गुणों की चर्चा श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥ sri bhagavanuvaca paran bhuyah pravaksyami jnananan jnanamuttamam. yajjnatva munayah sarve paran siddhimito gatah৷৷14.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा – हे अर्जुन! समस्त ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ इस परम-ज्ञान को मैं तेरे लिये फिर … Read more

अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय तेरह

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग शरीर और आत्मा का संबंध श्रीभगवानुवाच क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ ksetrajnan capi man viddhi sarvaksetresu bharata. ksetraksetrajnayorjnanan yattajjnanan matan mama৷৷13.3৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से … Read more

अध्याय 12: भक्तियोग

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय बारह

भक्तियोग  भक्ति के विभिन्न प्रकार और उनका महत्व अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ arjuna uvaca evan satatayukta ye bhaktastvan paryupasate. yecapyaksaramavyaktan tesan ke yogavittamah৷৷12.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को … Read more

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शन योग

सम्पूर्ण श्रीमद्‍भगवद्‍गीता अध्याय ग्यारह

विश्वरूपदर्शन योग  भगवान कृष्ण का विश्वरूपदर्शन अर्जुन उवाच मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ arjuna uvaca madanugrahaya paraman guhyamadhyatmasanjnitam. yattvayoktan vacastena moho.yan vigato mama৷৷11.1৷৷ भावार्थ : अर्जुन बोले- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया … Read more